नोएडा, 8 जुलाई 2026 | रिपोर्ट: सिमरन सिंह
भगवान पुरी रथयात्रा भारत के शीर्ष धार्मिक उत्सवों में से एक मानी जाती है। ओडिशा के पुरी धाम में आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से आरंभ होने वाली यह यात्रा भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के नगर भ्रमण का प्रतिनिधित्व करती है। यह मान्यता है कि इस रथयात्रा में भगवान स्वयं श्रद्धालुओं के बीच आकर उनका आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
पुरी रथयात्रा का धार्मिक महत्व
हिंदू विश्वासों के अनुसार भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण स्वरूप माना जाता है। रथयात्रा के समय तीनों देवता विशाल रथों में सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडीचा मंदिर की यात्रा करते हैं। स्कंद पुराण सहित कई धार्मिक ग्रंथों में इस यात्रा के दर्शन और भागीदारी को पुण्यकारी बताया गया है। रथ खींचने को भक्त विशेष भाग्य और मुक्ति का साधन मानते हैं।
पुरी रथयात्रा की परंपराएं
रथयात्रा में आगे भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ होता है, इसके बाद देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ और अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ होता है। गुंडीचा मंदिर में नौ दिनों तक विशेष दर्शन किए जाते हैं। इस समय श्रद्धालुओं को प्रसिद्ध महाप्रसाद भी बांटा जाता है, जिसका धार्मिक महत्व बहुत खास माना जाता है।
आस्था और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक
पुरी रथयात्रा सिर्फ एक धार्मिक समारोह नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक एकता और सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक है। देश-विदेश से लाखों भक्त इस पर्व में भाग लेते हैं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ का यह उत्सव सभी लोगों को समान रूप से आशीर्वाद देने और मानवता, सहिष्णुता तथा जनकल्याण का संदेश देने का साधन है।
